मानवता से जो पूर्ण हो, वही मनुष्य कहलाता
बिन मानवता के मानव भी, पशुतुल्य रह जाता है
: मानव जीवन का लक्ष्य है समग्रता से खिलना, खुलना और खेलना यानी अपनी उच्चतम संभावना को खोलना। ... उसी तरह समग्रता से जीकर सारे संसार के लिए निमित्त बनना ही मानव जीवन का मूल लक्ष्य है। इस संसार में रहकर हरेक को पूर्णता से खुलकर, खिलकर, वह करना है जो वह कर सकता है। मानव जीवन के लक्ष्य के बारे में आज तक लोगों की यही धारणा रही है कि भरपूर धन-दौलत, नाम-शोहरत, मान-इ़ज़्ज़त कमाने में ही मानव जीवन की सार्थकता है। लोगों से यह ग़लती हो जाती है कि वे पैसे को ही अपना लक्ष्य बना लेते हैं। पैसा सुविधा है, मज़बूत रास्ता है मगर मंज़िल नहीं। स़िर्फ करियर बनाना, पैसे इकट्ठे करना, शादी करना, बच्चे पैदा करना, उन बच्चों का करियर बनाना, उनके बच्चों का पालन-पोषण करके मर जाना ही मानव जीवन का लक्ष्य नहीं है।जीवन का मूल लक्ष्य है स्वयं जीवन को जाने, जीवन अपनी वास्तविकता को प्राप्त होें, स्वअनुभव करे’। यानी जीवन का लक्ष्य है वह स्वअनुभव प्राप्त करना, जिसे आज तक अलग-अलग नामों से जाना गया है, जैसे साक्षी, स्वसाक्षी, अल्लाह, ईश्वर, चैतन्य इत्यादि। वही ज़िंदा चैतन्य हमारे अंदर है, जिस वजह से हमारा शरीर चल रहा है, बोल रहा है, देख रहा है, अलग-अलग तरह की अभिव्यक्ति कर रहा है वरना शरीर तो केवल शव है। हमारे अंदर जो शिव है, वही ज़िंदा तत्व जीवन है, जिसे पाने को ही मानव जीवन का मूल लक्ष्य कहना चाहिए। जब इंसान के शरीर में जीवन अपनी वास्तविकता को प्राप्त होता है, तब उसे आत्मसाक्षात्कार कहते हैं।
मानव जीवन में दीक्षा कितनी जरूरी ?
“जब तक पूर्ण गुरु का सत्संग सुनने को नहीं मिलता तब तक इस बात का अंदाजा ही नहीं लगता कि मनुष्य जीवन कितना कीमती है ।“
चाहे आप कितने भी धनी पुरुष हो, गोरखनाथ जी जैसे सिद्ध पुरुष हो, अनगिनत कलाओं के स्वामी हो, समाज में मान-सम्मान प्राप्त शख्सीयत हो, चाहे इस पृथ्वी के राजा भी क्यों न हो, अगर गुरु दीक्षा नही ली है तो स्वर्ग में भी स्थान नहीं मिलता। इस संबंध में सुखदेव मुनि की कथा प्रमाणित है
कबीर साहेब कहते हैं ।
गुरु बिन माला फेरते,गुरु बिन देते दान।
गुरु बिन दोनों निष्फल है, चाहे पूछ लो वेद पुराण।।
और अधिक जानकारी के लिए देखें साधना टीवी पर प्रसारित साम 7.30पीएम पर।
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Wwe. supreme.God.com
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: मानव जीवन का लक्ष्य है समग्रता से खिलना, खुलना और खेलना यानी अपनी उच्चतम संभावना को खोलना। ... उसी तरह समग्रता से जीकर सारे संसार के लिए निमित्त बनना ही मानव जीवन का मूल लक्ष्य है। इस संसार में रहकर हरेक को पूर्णता से खुलकर, खिलकर, वह करना है जो वह कर सकता है। मानव जीवन के लक्ष्य के बारे में आज तक लोगों की यही धारणा रही है कि भरपूर धन-दौलत, नाम-शोहरत, मान-इ़ज़्ज़त कमाने में ही मानव जीवन की सार्थकता है। लोगों से यह ग़लती हो जाती है कि वे पैसे को ही अपना लक्ष्य बना लेते हैं। पैसा सुविधा है, मज़बूत रास्ता है मगर मंज़िल नहीं। स़िर्फ करियर बनाना, पैसे इकट्ठे करना, शादी करना, बच्चे पैदा करना, उन बच्चों का करियर बनाना, उनके बच्चों का पालन-पोषण करके मर जाना ही मानव जीवन का लक्ष्य नहीं है।जीवन का मूल लक्ष्य है स्वयं जीवन को जाने, जीवन अपनी वास्तविकता को प्राप्त होें, स्वअनुभव करे’। यानी जीवन का लक्ष्य है वह स्वअनुभव प्राप्त करना, जिसे आज तक अलग-अलग नामों से जाना गया है, जैसे साक्षी, स्वसाक्षी, अल्लाह, ईश्वर, चैतन्य इत्यादि। वही ज़िंदा चैतन्य हमारे अंदर है, जिस वजह से हमारा शरीर चल रहा है, बोल रहा है, देख रहा है, अलग-अलग तरह की अभिव्यक्ति कर रहा है वरना शरीर तो केवल शव है। हमारे अंदर जो शिव है, वही ज़िंदा तत्व जीवन है, जिसे पाने को ही मानव जीवन का मूल लक्ष्य कहना चाहिए। जब इंसान के शरीर में जीवन अपनी वास्तविकता को प्राप्त होता है, तब उसे आत्मसाक्षात्कार कहते हैं।
मानव जीवन में दीक्षा कितनी जरूरी ?
“जब तक पूर्ण गुरु का सत्संग सुनने को नहीं मिलता तब तक इस बात का अंदाजा ही नहीं लगता कि मनुष्य जीवन कितना कीमती है ।“
चाहे आप कितने भी धनी पुरुष हो, गोरखनाथ जी जैसे सिद्ध पुरुष हो, अनगिनत कलाओं के स्वामी हो, समाज में मान-सम्मान प्राप्त शख्सीयत हो, चाहे इस पृथ्वी के राजा भी क्यों न हो, अगर गुरु दीक्षा नही ली है तो स्वर्ग में भी स्थान नहीं मिलता। इस संबंध में सुखदेव मुनि की कथा प्रमाणित है
कबीर साहेब कहते हैं ।
गुरु बिन माला फेरते,गुरु बिन देते दान।
गुरु बिन दोनों निष्फल है, चाहे पूछ लो वेद पुराण।।
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